Tuesday, 2 April 2013

“कुदरत की इकाईयाँ”





लोगो ने कहा………….
अगर जिंदगी को जीना है;
तो काँटो से सीखो, कलियो से सीखो, बादल से सीखो,
मै सीखता रहा हर एक बंदे की नुमाईश पर……………
कि फिर………….
किसी ने कहा खुदा की इबादत से सीखो,
खिलते फूलो से सीखो, मौसम की आहट से सीखो……………………..

सिखाता रहा मुझे हर एक फरिश्ता,
कि मिलती रही मौसम की गहराईयाँ,
समुन्दर को छु लू ऐसा मेरा कद तो नही दोस्तो,
लेकिन आप अपनो से मिलती रही ऊचाईयाँ……..
सारे अरमानो को मैने इंसानियत मे उतारा जब,
मुझे मिलती रही खुशबू और आपके प्यार की रूबाईयाँ……………………….

तुकबंदी कहो या कहलेना इसे दिल की धड़कन,
सिखाती रही मुश्किले और बनती रही कहानियाँ,
कुदरत का स्पर्श मिलता रहा हर एक स्थान पर,
चाहे हो धरती, बादल, काँटे या अपनो की अच्छाईयाँ,
सारा कुछ इसी का है यह फूल, पौधे,
सब इसकी ही तो है इकाईंयाँ………………………
कुदरत ने दूर की मेरे दिल की हर एक तनहाईयाँ,
आप अपनो से मिलती रही जीवन को गहराईयाँ,
सब इसकी ही तो है इकाईयाँ……………….सब इसकी ही तो है इकाईयाँ……………………….

रचना:
प्रतीक संचेती

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    इंजीनियर प्रदीप कुमार साहनी अभी कुछ दिनों के लिए व्यस्त है। इसलिए आज मेरी पसंद के लिंकों में आपका लिंक भी चर्चा मंच पर सम्मिलित किया जा रहा है और आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (03-04-2013) के “शून्य में संसार है” (चर्चा मंच-1203) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...सादर..!

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    1. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद शास्त्री जी।

      सादर
      प्रतीक

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