Saturday 27 October 2012



कई कहते है
मैने शब्दो मे
खुद को कस रखा है,
मै क्या बताऊँ उन्हे
इन्ही शब्दो से
मेरा दिल ढ़खा है,
कहने को तो
बहुत “गम” दिये
इस “हसीन जिंदगी” ने,
लेकिन जिंदादिलि का हक
बस इन्ही शब्दो मे बसा है।

कई कहते है,
मैने शब्दो मे
खुद को कस रखा है।

जहाँ
मन के भावो की
उड़ान मिले,
जहाँ
मुश्किलो मे भी,
खुला आसमान मिले,
ऐसे लम्हो को
कैसे छोड़ दू मै,
यह
लिखना कहाँ
मेरी जिंदगी का गिला है।

कई कहते है
मैने शब्दो मे
खुद को कस रखा है।

रचना:
प्रतीक संचेती

Wednesday 17 October 2012

“प्यार से कहता रहा”



प्यार से कहता रहा हुँ,
देख तेरे रूप कितने,
पास तेरी धमनियो मे,
बह रहे मगरूर कितने।

आज तूने किस कदर,
इन अदाओ को सवारा,
जुल्फ की अंगड़ाईयो से,
गीत का मंजर बिखारा।

इन निगाहो मे छिपी है,
मदहोश करती कुछ लतायें,
इन नजारो मे बिछे है,
जिंदगी के सूल कितने।

प्यार से कहता रहा हुँ,
देख तेरे रूप कितने।

रचना:
प्रतीक संचेती

Friday 12 October 2012

दिल के करीब लम्हे



छोटे से कंधे पर सो जाना,
फिर अपनी बक-बक से उसे पकाना,
EMOTION की गलियो मे खोकर,
MIND को FRACTURE कर जाना।

कही हिन्दी मे बक-बक करना,
कही ENGLISH से HINGLISH बनाना,
वह रातो को जागना,
वह दिनो मे लोरी सुनाना।

CLASS ROOM मे बैठकर,
करना वही ALL TIME पक-पक,
फिर कुछ ही घंटो मे,
सपनो की दुनिया का ROUND लगाना।

सर के सवालो से,
HEAD को खुजाना,
फिर अंत मे दिमाग से,
खुद TEACHER को ही उलझाना।

पागलो सा रास्तो मे उचकना,
फिर SHOES की डोर जमाना,
वह पत्थरो को देना एक लात,
वह दोस्त के पैर मे लग जाना।

पूरे रास्ते भर फिर सुनना गाली,
और वह प्यार के झापड़ खाना,
IDIOT कहकर कमीने चिल्लाना,
फिर वही बातो मे खो जाना।

भईया-भाभी के जाल बुनना,
लेकिन BROTHER-SISTER से रिश्ते बनाना,
मस्त होकर कई पल बिताना,
फिर किताबो का IQ आजमाना।

SOLUTION के नये-नये तरीके खोजना,
लेकिन SHORTCUT से ही JUMP लगाना,
CARTOON और JOKER जैसे कई किरदार निभाना,
फिर हवाओ मे खुलकर खूब चिल्लाना।

पूरी दुनिया को करना ASIDE,
और हर पल को कुछ इस तरह जी जाना,
कभी हँसना कभी रोना,
लेकिन सारे लम्हो को साथ बिताना।

फिर छोटे से कंधे पर सो जाना………………………….

रचना:
प्रतीक संचेती

Monday 8 October 2012

प्रकृती के नजारे



कैद कर लुँ यह नजारे,
जो मुझे अपना रहे हैं,
फूल बादल सब मिलाकर,
गीत को फरमा रहे हैं।

वह जो मानव कर रहा है,
धूल की उत्तम सफाई,
वह धुँआ जो उड़ रहा है,
कह रहा चल अब बुराई।

यह नियम है प्रकृती का,
बैर को जो है मिटाना,
साथ जीना हर कदम पर,
देखना फिर तू जमाना।

आस भी तू ना लगाये,
ऐसी फहफिल जम रही है,
कैद कर लुँ यह नजारे,
प्रकृती बदल रही है……………….

रचना:
प्रतीक संचेती

“जिंदगी की मधुशाला”


लाख पी है आज मैने,
जिंदगी की वह रुमानी,
खूब पी है आज मैने,
काँच बोतल से कहानी,
आज मैने झाँक कर,
रस लवो को पीस डाला,
आज मैने जिंदगी के कुछ हदो को सींच डाला, जिंदगी की मधुशाला।

आज हाला की खता पर,
खूब काजल भी जलाये,
आज मैने साफ कहकर,
खूब दिवाने बनाये,
आज ठस मे पी गया मै,
जिंदगी का वह निराला,
खूब खीच कर बुलाई और यौवन की वह बाला, जिंदगी की मधुशाला।

खूब नाचा है मदिरा,
आज मेरे पथ चरण से,
खूब खोया है मुसाफिर,
रास्तो के चल-गमन से,
आज मधु का वह प्याला,
जाम इतना भर गया है,
आज मुश्किल खो गई है बट गई जो राजमाला, जिंदगी की मधुशाला। 

रचना:
प्रतीक संचेती